उन्नाव में यातायात व्यवस्था बेहाल, नो-पार्किंग सिर्फ बोर्डों तक सीमित, चौराहों पर जाम, फुटपाथ बने पार्किंग स्थल, एंबुलेंस फंसी, पुलिस मूकदर्शक, आमजन त्रस्त

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शिवम् तिवारी
नगर संवाददाता, उन्नाव

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में यातायात व्यवस्था पूरी तरह से चरमराई हुई नजर आ रही है। शहर के प्रमुख चौराहों से लेकर मुख्य सड़कों तक प्रतिदिन जाम, अव्यवस्था और नियमों की खुली अवहेलना आम बात हो गई है। नो-पार्किंग के बड़े-बड़े बोर्ड लगे होने के बावजूद उन्हीं के नीचे बेखौफ खड़ी भारी गाड़ियां प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रही हैं।

स्थिति यह है कि पैदल यात्रियों के लिए बनाए गए फुटपाथ और सड़क किनारे अब अवैध पार्किंग में तब्दील हो चुके हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं अपनी जान जोखिम में डालकर सड़क के बीच चलने को मजबूर हैं। जाम की वजह से कई बार एंबुलेंस और अन्य आपात सेवाएं भी फंसी नजर आती हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों और यातायात पुलिस की निष्क्रियता जस की तस बनी हुई है।

चौराहों पर तैनात पुलिसकर्मी अक्सर मूकदर्शक बने दिखाई देते हैं। नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई की बजाय सांठ-गांठ और चयनात्मक चालान की चर्चाएं शहर में आम हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यातायात नियम सिर्फ आम जनता के लिए ही बने हैं? क्या रसूखदारों और बड़ी गाड़ियों पर कानून लागू नहीं होता?

शहर की बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या के बावजूद न तो स्थायी पार्किंग की कोई ठोस व्यवस्था की गई है और न ही यातायात नियंत्रण की प्रभावी योजना दिखाई देती है। हर दिन जाम, हर दिन परेशानी और हर दिन वही लापरवाही—उन्नाव की यातायात व्यवस्था की पहचान बनती जा रही है।

खासतौर पर डीएम आवास से लेकर कचहरी और एसपी कार्यालय तक का मार्ग अक्सर बड़ी गाड़ियों से जाम रहता है, जिससे आम जनमानस को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

वहीं संतुलनहीन बैटरी रिक्शा चालक सड़क पर ही वाहन खड़ा कर सवारियां भरते नजर आते हैं, जिससे यातायात व्यवस्था और अधिक प्रभावित होती है।

अब बड़ा सवाल यह है कि जिम्मेदार अधिकारी कब जागेंगे? या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन कुंभकर्णी नींद से उठेगा? जरूरत है कि नियमों का उल्लंघन करने वालों पर बिना भेदभाव सख्त कार्रवाई की जाए, क्योंकि कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए—चाहे वह कोई भी हो।