अनुज कुमार वर्मा
ब्यूरो –सिद्धि टुडे, उन्नाव
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में यातायात व्यवस्था पूरी तरह बदहाली के दौर से गुजर रही है। शहर में न तो कहीं दिशा-सूचक बोर्ड दिखाई देते हैं, न ही स्पष्ट “नो पार्किंग” संकेतक, और न ही कोई व्यवस्थित पार्किंग की सुविधा। इसके बावजूद चालान काटने की कार्रवाई ऐसे की जाती है मानो आम और गरीब जनता ही कानून तोड़ने वाली हो।
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि जब आम नागरिक का चालान बिना किसी स्पष्ट बोर्ड या वैकल्पिक व्यवस्था के काट दिया जाता है, वहीं यातायात या पुलिस विभाग के कई कर्मचारी खुलेआम नियमों की धज्जियाँ उड़ाते नज़र आते हैं। बिना हेलमेट, गलत पार्किंग, सरकारी या निजी गाड़ियों को सड़क पर अवैध रूप से खड़ा करना—यह सब आम दृश्य बन चुका है। लेकिन इन पर कार्रवाई? लगभग शून्य।
यह दोहरा मापदंड कई सवाल खड़े करता है। क्या कानून सिर्फ गरीब और मजबूर जनता के लिए बना है? क्या वर्दी पहनते ही नियम खत्म हो जाते हैं? अगर एक आम आदमी नियम तोड़ता है तो तत्काल चालान, और जब वही गलती विभाग का कर्मचारी करे तो चुप्पी—आखिर क्यों?
यातायात नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन उनका निष्पक्ष पालन उससे भी ज्यादा जरूरी है। जब खुद कानून के रक्षक ही नियमों का मज़ाक उड़ाएँगे, तो जनता में कानून के प्रति सम्मान कैसे बनेगा?
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि उन्नाव प्रशासन आज तक ऐसी ठोस व्यवस्था नहीं बना पाया जिससे आम आदमी को राहत मिले—न पर्याप्त संकेतक, न पार्किंग ज़ोन, न पारदर्शी कार्रवाई। नतीजा यह कि यातायात व्यवस्था सुधार का नहीं, बल्कि सिर्फ चालान वसूली का माध्यम बनती जा रही है।
अब सवाल सिर्फ व्यवस्था का नहीं, न्याय का है।
जब नियम सबके लिए बराबर नहीं, तो भरोसा किस पर किया जाए?





























