अनुज कुमार वर्मा
ब्यूरो –सिद्धि टुडे, उन्नाव
सरकारी अस्पतालों पर गरीब और जरूरतमंद लोगों का सबसे ज्यादा भरोसा होता है, लेकिन जब वही अस्पताल अव्यवस्था और लापरवाही का शिकार हो जाएं, तो यह भरोसा धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। जिले के सरकारी अस्पतालों की स्थिति कुछ ऐसी ही नजर आ रही है, जहां मरीजों को इलाज से ज्यादा परेशानी व्यवस्थाओं की खामियों से झेलनी पड़ रही है।
अक्सर देखा जा रहा है कि मरीजों को इमरजेंसी वार्ड में भर्ती करने के बाद उनकी जांच तो कर ली जाती है, लेकिन जांच रिपोर्ट समय पर उपलब्ध नहीं कराई जाती। कई-कई दिन बीत जाने के बाद भी मरीज और उनके परिजन रिपोर्ट के लिए अस्पताल के अलग-अलग विभागों के चक्कर काटते रहते हैं।
जब मरीज या उनके परिजन रिपोर्ट के बारे में जानकारी लेने पहुंचते हैं, तो जिम्मेदार कर्मचारी सीधे जवाब देने के बजाय एक-दूसरे के पास भेजते रहते हैं। कहीं सिस्टर कागज पर लिखकर दूसरे विभाग भेज देती हैं, तो कहीं से यह कहकर टाल दिया जाता है कि “वार्ड बॉय को भेजिए, वही रिपोर्ट ले जाएगा।” इस प्रक्रिया में मरीजों को बेवजह इधर-उधर भटकना पड़ता है।
हैरानी की बात यह है कि इस तरह की लिखित पर्ची, जिस पर सिस्टर द्वारा दूसरे विभाग से रिपोर्ट लेने के निर्देश दिए गए हैं, उसका प्रमाण भी मौजूद है, जो अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में कोई भी कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं दिखता। वार्ड बॉय से लेकर सिस्टर और डॉक्टरों तक की लापरवाही साफ नजर आती है, जिससे मरीज खुद को असहाय महसूस करता है।
सरकारी अस्पतालों का उद्देश्य लोगों को बेहतर और सुलभ इलाज उपलब्ध कराना होता है, लेकिन वर्तमान हालात यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या मरीजों को समय पर जानकारी और सुविधाएं मिल पा रही हैं?
जरूरत है कि स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारी इस व्यवस्था पर गंभीरता से ध्यान दें और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करें, ताकि अस्पतालों में आने वाले मरीजों को इलाज के साथ-साथ सम्मान और सही जानकारी भी मिल सके।






























