अनुज कुमार वर्मा
ब्यूरो –सिद्धि टुडे, उन्नाव
गौवंशों को गौशाला पहुंचाने में नगर पालिका असमर्थ, प्रशासन मौन लगातार खबरें प्रकाशित होने और जनआक्रोश बढ़ने के बावजूद बेसहारा गौवंशों की समस्या जस की तस बनी हुई है। शहर की गलियों और सड़कों पर रोजाना सैकड़ों गायें भटक रही हैं। हादसे और ट्रैफिक जाम आम बात हो गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कोई भी गौवंश सड़क पर बेसहारा न दिखे, लेकिन उन्नाव में उनके आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
नगर पालिका का ढर्रा, प्रशासन की चुप्पी
नगर पालिका के पास पशुओं को पकड़ने के वाहन और कर्मचारी दोनों मौजूद हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल केवल दिखावे तक सीमित है। कभी-कभार वीआईपी दौरे पर ही सफाई और गौवंश हटाने की कार्रवाई होती है। नियमित अभियान चलाने की कोई योजना नजर नहीं आती। वहीं प्रशासन भी इस पर आंख मूंदे बैठा है।
गौशालाओं के केयरटेकर की भूमिका संदिग्ध
गौशालाओं की स्थिति भी बेहद दयनीय है। वहां पहले से मौजूद पशु चारे और दवाइयों की कमी से जूझ रहे हैं। कई बार भूख-प्यास और बीमारी से गौवंश दम तोड़ देते हैं। सवाल उठता है कि जब नगर पालिका यह कहकर जिम्मेदारी से बचती है कि यह गौशालाओं का काम है, तो फिर वहां के केयरटेकर क्यों सक्रिय नहीं हैं? केयरटेकर का दायित्व है कि वे गौवंशों की देखभाल और नए पशुओं को समायोजित करने की तैयारी करें। लेकिन हकीकत यह है कि वे भी अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं।
जनता का गुस्सा, आदेशों की अनदेखी
शहरवासियों का कहना है कि जब मुख्यमंत्री बार-बार आदेश जारी कर रहे हैं तो फिर स्थानीय प्रशासन और गौशालाओं का प्रबंधन क्यों लापरवाह है? दुकानदारों और राहगीरों का आरोप है कि प्रशासन और नगर पालिका मिलकर एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं और आखिर में पीड़ा जनता को झेलनी पड़ती है।
जागरूक समाज की मांग
स्थानीय समाजसेवी संगठनों की मांग है कि केवल नगर पालिका ही नहीं, बल्कि गौशालाओं के केयरटेकर पर भी सख्त कार्रवाई हो। यदि वे अपनी जिम्मेदारी निभाएं तो कोई भी गौवंश सड़क पर भटकता न दिखे। प्रशासन को चाहिए कि नगर पालिका और गौशाला प्रबंधन के बीच समन्वय स्थापित कर सख्त मॉनिटरिंग करे।
संवाददाता की नज़र
उन्नाव में गौवंशों का संकट यह दर्शाता है कि केवल नगर पालिका ही नहीं, बल्कि गौशाला प्रबंधन और केयरटेकर भी बराबर के दोषी हैं। लगातार खबरों और मुख्यमंत्री के आदेशों के बावजूद कोई असर न होना यह साबित करता है कि जिम्मेदार तंत्र लापरवाही और टालमटोल से बाहर निकलने को तैयार नहीं। यदि समय रहते ठोस कदम न उठाए गए तो यह समस्या और भी विकराल रूप धारण कर सकती है।






























