निखिल वर्मा
नगर संवाददाता, उन्नाव
उन्नाव, पी.डी. नगर – उन्नाव का ‘अथर्व नाक-कान-गला (ENT) अस्पताल’ आजकल मरीजों के इलाज से ज्यादा उनके आर्थिक शोषण के लिए चर्चित हो गया है। इमरजेंसी सेवा देने के नाम पर यह अस्पताल अब मानवता की धज्जियां उड़ाने और मरीजों की मजबूरी को कैश में बदलने का अड्डा बन चुका है।
यहां इलाज की प्राथमिकता मरीज की हालत से नहीं, उसकी जेब की गहराई से तय होती है। “जितना पैसा, उतना इलाज” – यही अस्पताल की अंदरूनी नीति बन चुकी है।
इमरजेंसी में भी पैसे पहले, इलाज बाद में
मरीज गंभीर हो या जीवन-मरण की स्थिति में हो, यदि एडवांस भुगतान नहीं किया गया तो उसे घंटों लाइन में इंतजार करना पड़ता है। परिजन गुहार लगाते रहते हैं, लेकिन डॉक्टरों और स्टाफ को सिर्फ फीस दिखाई देती है। ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जहां मरीज की हालत बिगड़ने के बावजूद पैसे के अभाव में समय पर इलाज नहीं दिया गया।
स्टाफ का बर्ताव – कठोर और संवेदनहीन
अस्पताल के कर्मचारियों का व्यवहार भी मरीजों और उनके परिजनों के साथ बेहद रूखा और असभ्य होता है। किसी प्रकार की जानकारी देने के बजाय उन्हें टका सा जवाब दिया जाता है – “पहले पैसा दीजिए, तभी कुछ होगा।” न मरीज की पीड़ा का ध्यान, न परिजनों की मानसिक स्थिति की परवाह।
दवाएं भी जबरन अपनी मेडिकल से, वह भी बिना छूट के
अस्पताल प्रबंधन मरीजों को अपने ही मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर करता है। आश्चर्य की बात यह है कि इन दवाओं पर एक पैसे की भी छूट नहीं मिलती, जबकि शहर के अन्य मेडिकल स्टोरों पर वही दवाएं 20% से 40% तक छूट में उपलब्ध होती हैं। यह एक सुनियोजित तरीका है मरीजों से दोहरी लूट करने का – पहले इलाज के नाम पर, फिर दवा के नाम पर।
स्थानीय लोगों में गुस्सा, प्रशासन चुप
स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल में गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न जैसी स्थिति बन जाती है। अगर किसी के पास पैसा नहीं है, तो उसकी जान बचना मुश्किल हो जाता है।
इसके बावजूद, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग अब तक चुप्पी साधे हुए हैं। यह चुप्पी कहीं न कहीं मिलीभगत की आशंका को और गहरा कर रही है।






























