उप मुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री के तमाम आदेशों के बाद भी सरकारी अस्पताल बने वसूली केंद्र

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अनुज कुमार वर्मा
ब्यूरो – सिद्धि टुडे, उन्नाव

जिला अस्पताल में वसूली का खेल बेखौफ, गरीबों की जेब पर डाका—आखिर जिम्मेदार कौन?

जनपद के जिला अस्पताल में इलाज के नाम पर कथित रूप से वसूली का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई एक बार फिर उजागर होती नजर आ रही है। कान के ऑपरेशन के नाम पर रुपये लेने का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें एक डॉक्टर का सहकर्मी एक ही दिन दो अलग-अलग मरीजों के परिजनों से ₹9000-₹9000 रुपये लेते हुए दिखाई दे रहा है। इस घटना ने गरीब मरीजों की उस उम्मीद को झकझोर दिया है, जिसके सहारे वे सरकारी अस्पताल को भगवान का घर मानकर इलाज कराने पहुंचते हैं।

उपलब्ध वीडियो में कथित रूप से दो मरीजों के परिजनों से कुल ₹18,000 रुपये लिए जाने की बात सामने आई है। इतना ही नहीं, वीडियो में यह भी कथित रूप से कहा जा रहा है कि यह रुपये ‘डॉक्टर साहब’ को दिए जाएंगे।

स्थिति केवल जिला अस्पताल तक सीमित नहीं बताई जा रही है। महिला अस्पताल को लेकर भी लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, जहां प्रसव (डिलीवरी) के दौरान रुपये मांगने के आरोप लगते रहे हैं। इसके अलावा, मरीजों को अस्पताल में उपलब्ध दवाइयों के बजाय बाहर की महंगी दवाइयां लिखे जाने की शिकायतें भी आम हो चुकी हैं। ऐसे हालात में गरीब मरीज इलाज से पहले ही आर्थिक बोझ के नीचे दब जाता है।

प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। उप मुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक लगातार अस्पतालों का निरीक्षण करते नजर आते हैं और सख्त निर्देश देने की बात कही जाती है। लेकिन सवाल यह है कि यदि जमीनी स्तर पर इस तरह की कथित वसूली जारी है, तो इन निरीक्षणों और निर्देशों का वास्तविक असर आखिर कहां दिखाई दे रहा है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि जब कोई वीआईपी या उच्च अधिकारी निरीक्षण के लिए आता है, तो कुछ समय के लिए अस्पताल की तस्वीर बदल जाती है। वार्ड साफ दिखने लगते हैं, कर्मचारी सतर्क नजर आते हैं, लेकिन जैसे ही निरीक्षण समाप्त होता है, व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या निरीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं?

हाल ही में जिला अस्पताल परिसर में एक मृत नवजात शिशु मिलने की घटना ने भी अस्पताल की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
इस मामले में अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने न आने से लोगों के बीच आक्रोश बना हुआ है। यह स्थिति कहीं न कहीं उच्च अधिकारियों के संलिप्त होने का भी संदेह उत्पन्न करती है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला अस्पताल और महिला अस्पताल में सामने आ रही इन कथित वसूली की घटनाओं पर आखिर कब सख्त कार्रवाई होगी। क्या दोष केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर डालकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा, या फिर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर भ्रष्ट डाक्टर पर कार्यवाही की जाएगी?

गरीब मरीज आज भी यह सोचकर अस्पताल पहुंचता है कि यहां डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं, लेकिन जब इलाज के नाम पर जेब ढीली करनी पड़े, तो यह भरोसा भी धीरे-धीरे टूटता नजर आता है। अब जनता को इंतजार है कि इस पूरे मामले में जिम्मेदार लोगों पर कब और कैसी कार्रवाई होती है।